GREAT BARRIER REEF-EVOLUTION AND SURVIVAL

अगर आप UPSC या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओ की तैयारी कर रहे है तो Science एंड Technology का फील्ड आपके लिये बहुत ही उपयोगी है। हम अपने इस ब्लॉग पर नए शोध और खोजो की जानकारी आपको हिंदी में देते है। आज हम आपको Great Barrier Reef – Evolution and Survival के बारे में हाल ही में हुई खोज और रीफ से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकरी देंगे। तो पोस्ट को पूरा पढ़े। 

great barrier reef - evolution and survival

Great Barrier Reef – Evolution and Survival:-

वैज्ञानिको ने नवीन आणविक तकनीक का उपयोग करके यह पता लगाया है कि कैसे विषम परिस्तिथियों में भी कोरल जीवित रहे। यह कोरल रीफ ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर स्थित है तथा इन्हे ग्रेट बैरियर रीफ के नाम से जाना जाता है। इस अभूतपूर्व खोज में यह पता लगा है कि किस प्रकार यह रीफ ग्रेट बैरियर रीफ की विशाल चट्टान में तब्दील हुआ है 

शोध से जुड़े एक वैज्ञानिक डॉ ईरा ने बताया की उन्होंने कोरल की एक ही प्रजाति के 150 अलग-अलग कॉलोनीज के जीनों को अनुक्रमित किया।  उन्होंने यह पता लगाने के लिए इसका उपयोग किया कि कौन से जीन रीफ्स के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण हैं। जीनोम एक समय को समाहित करने वाले कैप्सूल की तरह हैं, जिसमें ऐतिहासिक जानकारी का एक बड़ा खजाना है। 

आमतौर पर एकल जीनोम कोरल अध्ययन के लिये उपयुक्त है लेकिन अगर एक ही प्रजाति के सेकड़ो जीनोम मिल जाये तो यह सूचना की खान से कम नहीं है। टीम ने लाखो वर्ष पुराने उस समय को खोज लिया जब  तटीय कोरल ने चुम्बकीय आइलैंड से उत्तरी कोरल रीफ की तरफ रुख किया था। वैज्ञानिकों ने ग्रेट बैरियर रीफ की दो कोरल आबादी के उत्थान और पतन का आकलन किया।  

साथ ही उन्होंने यह भी पता लगाया की कैसे यह जीन बदलती परिस्तिथियों में भी विकसित हुआ है। अलग- अलग स्थानों पर इन जीनो के वितरण और प्रवाह को भी मापा गया। वैज्ञानिको ने यह भी बताया कि इस खोज के नतीजे कोरल रीफ के वर्तमान और भविष्य में संरक्षण के लिये उपयोगी है। 

डॉ. कुक और उनकी टीम को पहले से ही पता था कि कैसे ग्रेट बैरियर रीफ पर कोरल अत्यंत हानिकारक, उच्च लवणता और तापमान के बावजूद विकसित होने में सक्षम थे। उन्होंने यह जानकारी जीनोम के बीच की भिन्नता को जानकर हासिल की। 

कोरल रीफ की जीवन रणनीति:-

कोरल रीफ की जीवन रणनीतियों में किनारे पर पाए जाने वाले कोरल में जीन का विकास होना है। जीन्स का यह विकास पिछले 10,000 सालो में हुआ है। इस समय अवधि में अंतिम हिमयुग के बाद आई बाढ़ शामिल है। एक अन्य रणनीति में कोरल के द्धारा सहजीवी शैवाल के उपभेदो को अपनाना भी शमिल है। यह सभी नदी किनारे विषम परिस्तिथियों में पाये गये है। 

भविष्य की खोज इन्ही परिस्तिथियों को आधार बनाकर की जानी चाहिए। यह सामान परिस्तिथियाँ ही कोरल रीफ के अस्तित्व के लिये आवश्यक है। इन रीफ्स के भविष्य में खोने का भय है क्योकि इन रीफ्स पर मानव प्रभाव बहुत अधिक है जो इन्हे नुकसान पहुँचा रहा है। कोरल रीफ को जलवायु परिवर्तन, अधिक मछली व्यवसाय और बढ़ते प्रदूषण से भी खतरा है। 

उपर्युक्त सावधानियों के साथ-साथ पानी की शुद्धता को बनाये रखने की भी आवश्यकता है। ये हमें पिछली जलवायु परिस्थितियों, कोरल और प्रवाल भित्तियों के विकास में तालमेल को समझने में बेहद उपयोगी है। 

Great Barrier Reef – Evolution and Survival खोज से सम्बंधित महत्वपूर्ण शब्द:-

Coral Reef:-

कोरल रीफ एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र है जिसमे मुख्यतया रीफ बिल्डिंग का कार्य सम्पन्न होता है। इन रीफ्स में कई कोरल पॉलीप्स होते है जो कि कैल्शियम कार्बोनेट के द्धारा आपस में जुड़े होते है। ज्यादातर कोरल रीफ सख्त कोरल्स के बने होते है। 

कोरल्स सिनीडारिया फाइलम के एंथोज़ोआ वर्ग में सम्मिलित होते है। समुद्री एनीमोन और जेलिफ़िश शामिल भी इसी फाइलम में शामिल हैं। गर्म, उथले, साफ, पानी में यह भित्तियाँ सबसे अच्छी होती हैं। कोरल रीफ्स पहली बार 485 मिलियन साल पहले दिखाई दिए थे। 

Coral Bleaching ( प्रवाल विरंजन):- 

गर्म पानी के कारण प्रवाल का विरंजन हो सकता है। जब पानी बहुत गर्म होता है, तो कोरल अपने ऊतकों में रहने वाले शैवाल (zooxanthellae) को बाहर निकाल देंगे। जिससे कोरल पूरी तरह सफ़ेद हो जाता है।  इसे कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। विरंजन होने पर  कोरल मरता तो नहीं है पर मृत्यु के समान ही हो जाता है। प्रवाल के विरंजन का एक अन्य मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। कोरल अन्य कारणों से भी ब्लीच कर सकते हैं, जैसे बेहद कम ज्वार, प्रदूषण, या बहुत अधिक धूप।

Coral Reefs in India (भारत में प्रवाल भित्तियाँ ):-

भारत में प्रमुख भित्तियाँ मन्नार की खाड़ी, पालक खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप द्वीपों तक सीमित हैं।  पैची प्रवाल देश के मध्य पश्चिमी तट के अंतर-ज्वारीय क्षेत्रों में मौजूद है। भारत में प्रवाल भित्तियों को बहुत बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त और नष्ट किया जा रहा है। वे मानव जनित दबाव और हस्तक्षेप से नष्ट होने की गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। 

Great Barrier Reef:-

ग्रेट बैरियर रीफ, ऑस्ट्रेलिया के पूर्वोत्तर तट से दूर प्रशांत महासागर में दुनिया का सबसे लंबा और सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति संरचना है। ग्रेट बैरियर रीफ लगभग 1,250 मील (2,000 किमी) से अधिक की दूरी पर उत्तर-दक्षिण-पूर्व दिशा में फैली हुई है। 

इस रीफ में वास्तव में कुछ 2,100 व्यक्तिगत भित्तिया और कुछ 800 फ्रिंजिंग रीफ (द्वीपों के आसपास या समुद्र तट की सीमाएं) हैं। इनमे से कई आइलैंड सुख चुके है और कई कोरल सैंड में बदल चुके है।  इस विविधता के बावजूद प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति एक समान ही है। इनका निर्माण लाखो वर्षो में हुआ है। इनके निर्माण में समुद्री जीवो के कंकाल और कंकाल के कचरे के महत्वपूर्ण योगदान है। 

Genes:-

जीन, वंशानुगत जानकारी की इकाई है जो एक गुणसूत्र पर एक निश्चित स्थान पर रहती है। जीन प्रोटीन के संश्लेषण को निर्देशित करके अपना प्रभाव दिखाते है। यूकेरियोट्स (जैसे जानवर, पौधे और कवक) में, जीन कोशिका के नाभिक के भीतर निहित होते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया (जानवरों में) और क्लोरोप्लास्ट (पौधों में) भी नाभिक में भी जीन पाए जाते है परन्तु यह प्रमुख जीन से कुछ निचली श्रेणी के होते है। 

GENES

प्रोकैरियोट्स (जीवों में एक विशिष्ट नाभिक, जैसे बैक्टीरिया) की कमी होती है। प्रोकैरियोट्स में जीन एकल गुणसूत्र में निहित होते हैं जो कोशिका के कोशिका द्रव्य में रहते हैं। कुछ वायरस को छोड़कर जीन डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) से बने होते हैं। इन वायरस में जीन राइबोन्यूक्लिक एसिड (आरएनए)  पर पाये जाते है। 

आशा है यह पोस्ट great barrier reef – evolution and survival आपके लिए ज्ञानवर्धक होगी। अगर आपको यह पोस्ट अच्छी  लगी हो तो इसे लाइक और शेयर जरूर करे। इसके अलावा अगर किसी अन्य टॉपिक पर भी आप विस्तृत जानकारी चाहते है तो हमें कमेंट बॉक्स में लिखे। 

REFERENCE:- SCITECHDAILY

Reference: “Genomic signatures in the coral holobiont reveal host adaptations driven by Holocene climate change and reef specific symbionts” by Ira Cooke, Hua Ying, Sylvain Forêt, Pim Bongaerts, Jan M. Strugnell, Oleg Simakov, Jia Zhang, Matt A. Field, Mauricio Rodriguez-Lanetty, Sara C. Bell, David G. Bourne, Madeleine JH van Oppen, Mark A. Ragan and David J. Miller, 27 November 2020, Science Advances.
DOI: 10.1126/sciadv.abc6318

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